‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ के निर्माताओं ने फिल्म के नाम से ही संकेत दे दिया कि यह कोई सीधी-सादी कहानी नहीं होने वाली। इन दिनों ‘पुष्पा’ और ‘एनिमल’ जैसे किरदारों का दौर है, जहां नायक का आक्रामक, हिंसक और नैतिक रूप से धुंधला चेहरा दर्शकों को आकर्षित कर रहा है। ऐसे किरदार पर्दे पर ही नहीं, बॉक्स ऑफिस पर भी जमकर पैसा बटोर रहे हैं। ऐसे में यश जैसे बड़े सितारे को लेकर बनी ‘टॉक्सिक’ से उम्मीद होना स्वाभाविक है।
फिल्म की एक खास बात यह भी है कि इतने बड़े सितारे, विशाल बजट और बड़े पैमाने की फिल्म की कमान महिला निर्देशक गीतू मोहनदास के हाथ में है। भारतीय फिल्म उद्योग के इतिहास में इतनी बड़ी व्यावसायिक फिल्म का निर्देशन किसी महिला निर्देशक को मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अफसोस की बात यह है कि यह अनोखी बात यहीं खत्म हो जाती है। गीतू मोहनदास को मिला इतना बड़ा अवसर फिल्म की कमजोर कहानी और बिखरे हुए पटकथा लेखन के कारण अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाता।
फिल्म में यश का स्टारडम दिखाई देता है। पैसा भी पर्दे पर साफ नजर आता है। भव्य सेट, खूबसूरत लोकेशन, शानदार कैमरा वर्क और स्टाइलिश एक्शन इसकी ताकत हैं। लेकिन कमजोर, असमान और बेहद धीमी स्क्रिप्ट मनोरंजन का बड़ा हिस्सा छीन लेती है। जो दर्शक बड़े पर्दे पर यश का जबरदस्त मनोरंजन देखने पहुंचता है, वह कई मौकों पर खुद को उलझा हुआ और खाली हाथ महसूस कर सकता है।
फिल्म की कहानी आजादी से पहले शुरू होकर 1967 तक पहुंचती है। आजादी के बाद के गोवा की पृष्ठभूमि में हिंसा, सत्ता, नफरत और अपराध का संसार रचा गया है। केंद्र में है गैंगस्टर राया, जो अपनी वफादारी, नैतिकता और खुद को बदलने की कोशिश के बीच उलझा हुआ है।
फिल्म का संसार अंधेरा है और इसके किरदार भी उसी अंधेरे से निकलते हैं। कहानी यह बताने की कोशिश करती है कि जब किसी इंसान की जिंदगी नफरत और हिंसा से भरी हो, तो प्यार और खुद को सुधारने की कोशिश की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है। अंत की ओर फिल्म नफरत और पाप के बीच फर्क को लेकर कुछ दार्शनिक होने की कोशिश भी करती है।
राया का किरदार यश ने निभाया है, जबकि उसकी बहन गंगा के रोल में नयनतारा हैं। दोनों का बचपन कड़वी यादों से भरा रहा है और इसी वजह से उनके व्यक्तित्व में एक तरह की कठोरता है और वे इमोशनलेस हैं। राया के भीतर जैसे किसी रिश्ते को सामान्य तरीके से जीने की क्षमता ही खत्म हो चुकी है।
सर्कस चलाने वाली नाडिया से उसे प्यार हो जाता है। कियारा आडवाणी ने नाडिया का किरदार निभाया है। लेकिन राया की नफरत से भरी सोच उसके रिश्तों को लगातार बर्बाद करती रहती है, चाहे वो नाडिया के साथ हो या मेलिसा और रेबेका के साथ हो।
‘टॉक्सिक’ की कहानी-पटकथा-संवाद लेखन में यश का भी योगदान है, लेकिन विडंबना यही है कि फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी लिखावट ही बन जाती है।
फिल्म में कहानी से ज्यादा स्टाइल दिखाई देती है। ऐसा महसूस होता है कि पहले शानदार और स्टाइलिश दृश्य सोचे गए और बाद में उन्हें किसी तरह कहानी का हिस्सा बना दिया गया। नतीजा यह हुआ कि कई दृश्य अपने आसपास की कहानी से ठीक तरह जुड़ नहीं पाते।
कहानी में बहुत ज्यादा दम नहीं है, लेकिन समस्या सिर्फ कहानी की नहीं है। पटकथा भी उसे मजबूती से आगे नहीं ले जा पाती। शुरुआत में किरदारों और कहानी की दुनिया को समझने में दर्शक को समय लगता है। कई जगह घटनाएं इतनी उलझी हुई लगती हैं कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर हो क्या रहा है।
फिल्म को लगातार स्टाइलिश बनाने की कोशिश में कई बार तर्क को भी पीछे छोड़ दिया गया है। उदाहरण के लिए, नाडिया से प्यार करने वाला राया, रेबेका से शादी करने के लिए क्यों तैयार हो जाता है, इसे पूरी तरह स्थापित नहीं किया गया है। इसी तरह जिस राया को फिल्म दर्जनों गुंडों से अकेले भिड़ने और उन्हें बचाने वाला शख्स बताती है, वही एक बच्चे की मदद नहीं कर पाता। ऐसे प्रसंग किरदार की स्थापित छवि से मेल नहीं खाते।
फिल्म की कहानी गोवा में स्थापित है, लेकिन लड़ाई के कई दृश्य बर्फीले इलाकों में फिल्माए गए हैं। अगर इसके पीछे कहानी की कोई ठोस वजह है तो उसे प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं किया गया। ऐसे कई दृश्य हैं, जहां पटकथा कहानी की जरूरत से ज्यादा फिल्मकार की सुविधा के हिसाब से चलती नजर आती है।
संवाद भी अपेक्षाकृत कम हैं। कई मौकों पर किरदारों के संवाद के बजाय स्लो मोशन, उनका एटीट्यूड और बैकग्राउंड म्यूजिक के सहारे कहानी आगे बढ़ाई गई है। कुछ जगह यह तरीका प्रभाव पैदा करता है, लेकिन लगातार इस्तेमाल किए जाने पर यह बोझिल लगने लगता है।
‘टॉक्सिक’ का जरूरत से ज्यादा लाउड होना भी परेशान करता है। फिल्म में लगभग हर भावना को चरम तक ले जाने की कोशिश की गई है। कलाकार कई जगह चीखते-चिल्लाते नजर आते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक हो या गाने, उनमें भी जरूरत से ज्यादा शोर है।
विडंबना यह है कि इतनी ऊंची आवाज के बावजूद फिल्म की गति बेहद धीमी है। लंबे दृश्य फिल्म की रफ्तार को लगातार प्रभावित करते हैं। कुछ दृश्य इतने लंबे खिंचते हैं कि दर्शक घड़ी देखने लगते हैं।
पहला भाग मुख्य रूप से किरदारों को स्थापित करने में खर्च होता है। इसके बावजूद कुछ महत्वपूर्ण किरदार पूरी तरह उभर नहीं पाते। हुमा कुरैशी का किरदार इसका उदाहरण है। दूसरे भाग में फिल्म और ज्यादा बिखर जाती है और अंत तक पहुंचते-पहुंचते कहानी को किसी तरह समेटने की कोशिश की जाती है।
निर्देशक के रूप में गीतू मोहनदास एक तकनीशियन के तौर पर प्रभावित करती हैं। शॉट लेने का उनका तरीका, फ्रेम की बनावट और माहौल तैयार करने की क्षमता प्रभावशाली है।
उन्होंने फिल्म के लगभग हर फ्रेम को भव्य बनाने की कोशिश की है। किरदारों को स्टाइलिश तरीके से पेश किया गया है। यश हों, कियारा आडवाणी हों या नयनतारा, हर कलाकार की स्क्रीन प्रेजेंस पर खास ध्यान दिया गया है। सेट और माहौल का भी अच्छा इस्तेमाल किया गया है।
लेकिन फिल्म निर्माण में सिर्फ खूबसूरत फ्रेम काफी नहीं होते। कहानी को भी उतनी ही मजबूती से पकड़ना जरूरी होता है। यहीं गीतू मोहनदास कमजोर पड़ती हैं। उनकी तकनीकी खूबियां बार-बार नजर आती हैं, लेकिन कहानी कहने की कमजोरी उन तमाम खूबियों पर भारी पड़ जाती है। सीधे शब्दों में कहें तो ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल है, लेकिन स्टाइल या शैली के नीचे कहानी दब गई है।
अभिनय की बात करें तो यश ने राया के किरदार को जरूरी अंदाज, आक्रामकता और तेवर दिए हैं। उनके प्रशंसकों को उनका यह रूप निश्चित रूप से पसंद आएगा। दोहरी भूमिका में यश चौंकाते हैं। दोनों किरदारों को उन्होंने अलग-अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश की है और उनके हाव-भाव तथा व्यक्तित्व में फर्क दिखाई देता है। एक अभिनेता के रूप में यह उनके लिए चुनौतीपूर्ण काम था, जिसे उन्होंने प्रभावी ढंग से निभाया है।
कियारा आडवाणी फिल्म में बेहद ग्लैमरस नजर आती हैं। लेकिन सिर्फ खूबसूरती तक सीमित न रहते हुए उन्होंने एक कठिन किरदार को भावनात्मक गहराई देने की कोशिश की है। उनके किरदार की मोहब्बत और दर्द को उनके चेहरे के भावों से महसूस किया जा सकता है। कई दृश्यों में उनकी आंखें संवाद से ज्यादा कुछ कहती हैं।
नयनतारा का किरदार मजबूत और एक्शन से भरपूर है। उन्होंने इसे पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है। उनका व्यक्तित्व पर्दे पर प्रभाव छोड़ता है। तारा सुतारिया अभिनय के मामले में अपेक्षित असर नहीं छोड़ पातीं। हुमा कुरैशी जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री को भी ऐसा किरदार नहीं मिला, जिसमें वे अपनी क्षमता के अनुरूप उभर सकें। रुक्मिणी वसंथ का किरदार सीमित है और उन्हें ज्यादा अवसर नहीं मिला।
फिल्म के गाने कई संगीतकारों ने तैयार किए हैं। ‘तबाही’ सहित दो-तीन गाने अच्छे हैं और उनका फिल्मांकन भी शानदार है। गानों की प्रस्तुति फिल्म के भव्य दृश्य संसार के अनुरूप है। बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के अंधेरे और हिंसक माहौल को बनाए रखने में मदद करता है, हालांकि कई जगह संगीत जरूरत से ज्यादा तेज महसूस होता है।
राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। रोशनी, छाया, कलर, बैकग्राउंड और कैमरे की गति का उन्होंने बेहतरीन इस्तेमाल किया है। फिल्म की लगभग हर फ्रेम देखने लायक है। एक्शन भी फिल्म की ताकत है। बड़े पैमाने पर फिल्माए गए लड़ाई के दृश्य यश के स्टारडम को पूरी तरह सामने लाते हैं।
हालांकि संपादन कमजोर है। फिल्म की लंबाई कम से कम 45 मिनट घटाई जा सकती थी। गैरजरूरी लंबे दृश्यों और धीमी गति ने फिल्म के प्रभाव को काफी नुकसान पहुंचाया है।
कुल मिलाकर ‘टॉक्सिक’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें बहुत कुछ दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन बहुत कुछ कहने की कोशिश में कहानी पीछे छूट गई है। फिल्म में भव्यता है, शानदार दृश्य हैं, दमदार एक्शन है, यश का स्टारडम है और तकनीकी स्तर पर कई उपलब्धियां हैं। लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट, उलझी हुई कहानी, जरूरत से ज्यादा लंबे दृश्य और संपादन की कमजोरी मनोरंजन पर भारी पड़ती है।
गीतू मोहनदास एक बेहतरीन दृश्य संसार रचने में सफल रही हैं, लेकिन उस संसार के भीतर कहानी को मजबूती से बांध नहीं पाईं। फिल्म की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस स्टाइल को इसकी सबसे बड़ी ताकत होना था, वही अंततः इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। ‘टॉक्सिक’ में सब्सटेंस पर स्टाइल भारी है और यही वजह है कि यश की स्टार पावर और तकनीकी भव्यता के बावजूद फिल्म पूरी तरह प्रभावित नहीं कर पाती।




