नई दिल्ली। मध्य पूर्व में ईरान-इजरायल युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों पर हो रहे हमलों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संकट से निपटने के लिए जापान और यूरोप के पांच प्रमुख देश ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड एकजुट हो गए हैं। इन छह देशों ने संयुक्त बयान जारी कर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक सहयोग का ऐलान किया है। इसे अनौपचारिक रूप से ‘सिक्स नेशन ऑपरेशन’ कहा जा रहा है।
ईरान द्वारा ड्रोन, विस्फोटक नौकाओं और मिसाइलों से व्यापारिक जहाजों पर हमले किए जाने के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। सैकड़ों जहाज इस क्षेत्र के बाहर फंसे हुए हैं। यह मार्ग दुनिया के 20-25% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में एलपीजी का मुख्य रास्ता है। भारत, जापान, यूरोपीय देश और चीन जैसे बड़े आयातक देश इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा मंडरा रहा है।
छह देशों के इस गठबंधन ने कतर और सऊदी अरब के तेल-गैस संयंत्रों पर हालिया हमलों की तीखी निंदा की है। कतर एनर्जी के अनुसार, इन हमलों से उनकी 17% एलएनजी निर्यात क्षमता प्रभावित हुई है। अनुमान है कि इस नाकेबंदी और हमलों से सालाना 20 अरब डॉलर का राजस्व नुकसान हो सकता है। गठबंधन ने स्पष्ट किया है कि वे अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाकर बाजार को स्थिर करने का प्रयास करेंगे।
संयुक्त बयान में इन देशों ने ईरान को स्पष्ट चेतावनी दी है कि उसके सैन्य कार्यवाही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं। उन्होंने कहा कि नागरिक बुनियादी ढांचे और वैश्विक व्यापार मार्गों पर हमला अस्वीकार्य है। गठबंधन ने हमलों पर ‘समग्र रोक’ लगाने की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो वे हॉर्मुज में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े सैन्य कदम उठा सकते हैं।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए हॉर्मुज पर काफी हद तक निर्भर है। इस संकट से कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में उछाल आ सकता है। इधर अमेरिका पहले से ही ईरानी मिसाइल ठिकानों पर ‘बंकर बस्टर’ बमों से हमले कर रहा है। छह देशों का यह गठबंधन ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए ‘प्लान-B’ के तौर पर काम कर रहा है। जापान का शामिल होना खासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह अपनी पूरी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है।




